कभी तो मैंने खुश होकर जाम को चूमा।
तो कभी गम में हलक के नीचे उतारा।
लेकीन जब भी पी तो याद तुम्हारी ही आई .
बड़ी जालिम है ये जब भूलने के लिए पीता तो याद दिला देती,
और जब याद करने के लिए पिता तो भुला देती.
जब भी हमने शराब को पी तो जन्नत नज़र आई ,
और जब नशा उतरा तो बीबी हाथ में बेलन लिए नज़र आई.
शाम को जाम पिया सुबह को तौबा कर ली।
रिन्द के रिन्द रहें हाथ से जन्नत न गइ।। (अनाम)
रखते है कहीं पांव तो पडता है कहीं और ।
साकी तू जरा हाथ तो ले थाम हमारा।। (इँशा)
कजॆ की पीते थे मय-औ यह समझते थे कि हां ।
रंग लाएगी हमारी फाका-मस्ती एक दिन ।। (गालिब)
अंगूर में धरी थी पानी की चार बूंदे ।
जब से वो खिंच गइ है , तलवार हो गइ है।। (अनाम)
साकी तू मेरी जाम पे कुछ पढ के फूंक दे ।
पीता भी जाउँ और भरी की भरी रहे।। (अनाम)
साकिया अक्स पडा है जो तेरी आंखों का ।
और दो जाम नजर आते है पैमाने में ।। (अनाम)
दिल छोड के यार क्यूंकि जावे ?
जख्मी हो शिकार क्यूंकि जावे ?
जबतक ना मिले शराबे दीदार ,
आंखो का खुमार क्युंकि जावे ? (वली)
रंगे शराब से मेरी नियत बदल गइ ।
वाइज की बात रह गइ साकी की चल गइ।
तैयार थे नमाज पे हम सुन के जिक्रे-हूर ।
जलवा बुतों का देख के नियत बदल गइ ।।
चमका तेरा जमाल जो महफिल में वक्ते शाम ।
परवाना बेकरार हुआ शमां जल गइ।। (अकबर)
मस्जिद में बुलाता है हमें जाहिदे-नाफहम ।
होता अगर कुछ होश तो मैखाने ना जाते।। (अमीर मीनाइ)
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Wednesday, February 18, 2009
शराब
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3:57 AM
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ग़ालिब
ग़ालिब हमें न छेड़ के हम जोश-ए-अश्क*से ---------आँसुओं के बहाव
बैठे हैं हम तहैय्या-ए-तूफ़ाँ* किये हुए ------------तूफ़ान उठाने का फ़ैसला
होगा कोई ऐसा भी जो ग़ालिब को न जाने
शाइर तो वो अच्छा है प बदनाम बहुत है
ग़ालिब बुरा न मान जो ज़ाहिद बुरा कहे
ऐसा भी कोई है के सब अच्छा कहें जिसे
कहाँ मयख़ाने का दरवाज़ा ग़ालिब, और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले
जब तवक़्क़ो*ही उठ गई ग़ालिब --------आस, उम्मीद
क्यों किसी का गिला करे कोई
सफ़ीना* जब किनारे पे आ लगा ग़ालिब ------ नाव
ख़ुदा से क्या सितम-ए-जोर-ए-नाख़ुदा*कहिए ----- नाव चलाने वाले के सितम
असद*ख़ुशी से मेरे हाथ पाँव फूल गए ---------- ग़ालिब का नाम
कहा जब उसने ज़रा मेरे पाँव दाब तो दे
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब
के लगाए न लगे, और बुझाए न बुझे
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के
हुआ है शेह का मुसाहिब*फिरे है इतराता -------बादशाह की संगत में रहने वाला
वगरना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़्याल अच्छा है
बेख़ुदी बेसबब नहीं ग़ालिब
कुछ तो है जिस की परदा दारी है
मैंने माना के कुछ नहीं ग़ालिब
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है
काबा किस मुँह से जाओगे ग़ालिब
शर्म तुम को मगर नहीं आती
ग़ालिबे-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बन्द हैं
रोइये ज़ार ज़ार क्या, कीजिये हाय हाय क्यों
ग़ालिब छुटी शराब पर अब भी कभी कभी
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र व शब-ए-माहताब में ---जिस दिन बादल छाए हों, जिस रात चाँद चमक रहा हो
कुछ तो पढ़िए के लोग कहते हैं
आज ग़ालिब ग़ज़ल सरा न हुआ
ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़* ये तेरा बयान ग़ालिब-----भक्तिभाव की बातें
तुझे हम वली समझते, जो न बादा ख़्वार*होता--------शराब पीने वाला
ये लाश-ए-बेकफ़न असदे-ख़स्ता*जाँ की है -----परेशान ग़ालिब की लाश
हक़ मग़फ़िरत*करे अजब आज़ाद मर्द---------गुनाहों को मुआफ़ करे
पूछते हैं वो के ग़ालिब कौन है
कोई बतलाओ के हम बतलाएँ क्या
हम कहाँ के दाना* थे, किस हुनर में यकता* थे----- अकलमंद, माहिर
बेसबब हुआ ग़ालिब, दुश्मन आसमाँ अपना
रेख़ते* के तुम्ही उस्ताद नहीं हो ग़ालिब ---- उर्दू
कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था
मैंने मजनूँ पे लड़कपन में असद
संग उठाया था के सर याद आया
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Monday, February 16, 2009
शायरी
दिल की बात बताने से क्या हासिल होंगा ,
आंसुओ को बेकार बहने से क्या फायदा,
जाने भी दो छोडो, वही होंगा ,
जो मंजूरे खुदा होंगा॥
ज़माने की हर बला को हम हँस कर सह गएँ,
आंधियो में भी इतनी हिमत्त नही थी की हमको हीला पायें,
पर कम्बखत अपनो से बढ़ते फसलों ने हमें इस कदर तोडा,
की अब तो हल्की सी हवा भी उडने लगती है॥
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9:31 PM
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शायरी
लम्हो मे जो कट जाए वो क्या जिंदगी,
ऑसुओ मे जो बह जाए वो क्या जिंदगी,
जिंदगी का फलसफां हि कुछ और है,
जो हर किसी को समझ आए वो क्या जिंदगी ।
सूरज पास न हो, किरने आसपास रहती है,
दोस्त पास हो ना हो, दोस्ती आसपास रहती है,
वैसे ही आप पास हो ना हो लेकिन,
आपकी यादें हमेशा हमारे पास रहती है।
सोचते थे हर मोड पर आप का इंतेज़ार करेंगे॥
पर, पर, पर, पर, पर, पर, पर, पर, पर, कम्भाकत सड़क ही सीधी निकली...
हम ने माँगा था साथ उनका, वो जुदाई का गम दे गए,
हम यादो के सहारे जी लेते, वो भुल जाने की कसम दे गए!
आपके दिल में बस्जयेंगे एस एम एस की तरह।,.,
दिल में बजेंगे रिंगटोन की तरह.,.,
दोस्ती कम नहीं होगी बैलेंस की तरह.,.,
सिर्फ आप बीजी ना रहना नेटवोर्क की तरह.....
खिड़की से देखा तो रस्ते पे कोई नहीं था,
खिड़की से देखा तो रस्ते पे कोई नहीं था,
रस्ते पे जा के देखा तो खिड़की पे कोई नहीं था...
आंसुओ को लाया मत करो,
दिल की बात बताया मत करो,
लोग मुठ्ठी मे नमक लिये फिरते है,
अपने जख्म किसी को दिखाया मत करो।
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9:03 PM
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रहीम दास के दोहें
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय॥
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तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥
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बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय॥
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दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होय॥
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छिमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥
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खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान॥
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एकहि साधै सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहि सींचबो, फूलहि फलहि अघाय॥
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चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह॥
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आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गये, जबहि कहा कछु देहि॥
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जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय॥
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खीरा सिर ते काटिये, मलियत नमक लगाय।
रहिमन करुये मुखन को, चहियत इहै सजाय॥
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रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि॥
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जे गरीब पर हित करैं, हे रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥
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दोनों रहिमन एक से, जब लौं बोलत नाहिं।
जान परत हैं काक पिक, ऋतु वसंत कै माहि॥
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बड़े काम ओछो करै, तो न बड़ाई होय।
ज्यों रहीम हनुमंत को, गिरिधर कहे न कोय॥
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रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।
सुनि इठलैहैं लोग सब, बाटि न लैहै कोय॥
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माली आवत देख के, कलियन करे पुकारि।
फूले फूले चुनि लिये, कालि हमारी बारि॥
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मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय।
फट जाये तो ना मिले, कोटिन करो उपाय॥
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रहिमह ओछे नरन सो, बैर भली ना प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँति विपरीत॥
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रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन जाहि।
उनते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसत नाहि॥
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बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥
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रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥
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वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटनवारे को लगै, ज्यौं मेंहदी को रंग॥
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रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥
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बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥
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रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥
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रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥
कबीर के अनमोल बोल
काजी से जाने रहमान
कहा कबीर कछु आन न कीजै,
राम नाम जपि लाहा लीजै।
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चलती चक्की देख के कबीर दिया रोय।
दो पाटन के बीच में साबूत बचा न कोय।।
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पोथी पढ़ी- पढ़ी जग मुआ, पंडित भया न कोई।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।
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प्रेम न खेती उपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा प्रजा जेहि रुचे, सीस देहि ले जाय।
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जल में कुंभ कुंभ में जल है बाहरि भीतरि पानी।
फुटा कुंभ जल जलाहि समाना यहुतत कघैं गियानी।
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गुर गोविंद तौ एक है, दूजा यहू आकार।
आपा भेट जीवत मरै, तौ पावै करतार।।